Friday, June 22, 2012

सरहद से पार आती सदाएं: मेहदी हसन पर ईश मधु तलवार


आवाजों को सरहदों के पार जाने से रोका नहीं जा सकता। शायद इसीलिए राजस्थान के
लूणा गांव की आवाज रेत के धोरों में बहती हुई पाकिस्तान में मेहदी हसन तक पहुंच
जाती है और वे यहां आने के लिए छटपटाने लगते हैं। पाकिस्तान से खबर है कि
अस्वस्थ होने के बावजूद वे एक बार फिर अपनी जन्म भूमि पर आना चाहते हैं।

राजस्थान के शेखावाटी अंचल में झुंझुनूं जिले के लूणा गांव की हवा में आज भी
मेहदी हसन की खुशबू तैरती है। देश विभाजन के बाद लगभग 20 वर्ष की उम्र में वे
लूणा गांव से उखड़ कर पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन इस गांव की यादें आज तक उनका
पीछा करती हैं। वक्त के साथ उनके ज्यादातर संगी-साथी भी अब इस दुनिया को छोड़कर
जा चुके हैं, लेकिन गांव के दरख्तों, कुओं की मुंडेरों और खेतों में उनकी महक
आज भी महसूस की जा सकती है।

छूटी हुई जन्म स्थली की मिट्टी से किसी इंसान को कितना प्यार हो सकता है इसे
1977 के उन दिनों में झांक कर देखा जा सकता है जब मेहदी हसन पाकिस्तान जाने के
बाद पहली बार लूणा आए और यहां की मिट्टी में लोट-पोट हो कर रोने लगे। उस समय
जयपुर में गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बन कर जयपुर आए थे और
उनकी इच्छा पर उन्हें लूणा गांव ले जाया गया था। कारों का काफिला जब गांव की ओर
बढ़ रहा था तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रूकवा दी। काफिला थम गया। सड़क
किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर था, जहां रेत में लोटपोट हो कर वे पलटियां
खाने लगे और रोना शुरू कर दिया। कोई सोच नहीं सकता था कि धरती माता से ऐसे मिला
जा सकता है। ऐसा लग रहा था जैसे वे मां की गोद में लिपटकर रो रहे हों।

इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं-' वह भावुक कर देने वाला
अद्भूत दृश्य था। मेहदी हसन का बेटा भी उस समय उनके साथ था। वह घबरा गया कि
वालिद साहब को यह क्या हो गया? हमने उनसे कहा कि धैर्य रखें, कुछ नहीं होगा।
धीरे-धीरे वह शांत हो गए। बाद में उन्होंने बताया कि यहां बैठ कर वे भजन गया
करते थे।' मेहदी हसन ने तब यह भी बताया था कि पाकिस्तान में अब भी उनके परिवार
में सब लोग शेखावाटी में बोलते हैं। शेखावाटी की धरती उन्हें अपनी ओर खींचती
है।

मेहदी हसन के साथ इस यात्रा में आए उनके बेटे आसिफ मेहदी भी अब पाकिस्तान में
गजल गाते हैं और बाप-बेटे का एक साझा अलबम भी है-''दिल जो रोता है' ।
मेहदी हसन जब पहली बार लूणा आए तो पूरे गांव में हल्ला मच गया था-' मेंहद्यो
आयो है, मेंहद्यो आयो है। ' मेहदी हसन जहां जाते, लोग उनका छाछ-राबड़ी और
दूध-दही से स्वागत करते। इस यात्रा में झुंझुनूं में जिला कलेक्टर ने उनके
सम्मान में रात्रि भोज दिया था, लेकिन मेहदी हसन बिना बताए झुंझुनूं की एक
बस्ती में अपने रिश्ते की एक बहन के घर पहुंच गए और वहां मांग कर लहसन की चटनी
के साथ बाजरे की रोटी खाई। प्रशासनिक अधिकारी उन्हें ढूंढते रहे।

इस बार जब मेहदी हसन अपने गांव आएंगे तो शायद यह कहने वाला कोई नहीं मिलेगा कि
'मेंहद्यो आयो है।' गांव में अब एक नई पीढ़ी जन्म ले चुकी है, लेकिन वह इतना
जरूर जानती है कि इस गांव का मेहदी हसन गजल सम्राट है। जिन लोगों ने मेहदी हसन
को नहीं देखा, वे भी उन्हें प्यार और सम्मान करते है। शायद ऐसे ही वक्त के लिए
मेंहदी हसन ने यह गजल गाई है-''मौहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफिल में
लेकिन हम न होंगे।'

लगभग 250 घरों के लूणा गांव में आज भी कोई कार जैसी चीज चली जाए तो लोगों को यह
समझते देर नहीं लगती कि मसला मेहदी हसन के साथ जुड़ा है। मेहदी हसन की वजह से
ही लूणा को एक सड़क उपहार में मिल गई है जो गांव तक जाती है। हमारी गाड़ी जैसे
ही गांव में पहुंचती है तो एक ग्रामीण सांवरा छूटते ही बताता है कि मेहदी हसन
के बारे में जानना है तो नारायण सिंह के पास चले जाओ। वही सब कुछ बता सकता है।

दरअसल, लूणा में मेहदी हसन का अब एक ही साथी बचा है- नारायण सिंह। मेहदी हसन के
एक दोस्त और हैं- अर्जुन सिंह, लेकिन वे विक्षिप्त हो चुके हैं और उन्हें कोई
सुधबुध नहीं है। गांव का एक रिटायर्ड फौजी रामेश्वर लाल बताता है- ''मेहदी हसन
मेरे पिताजी (मालाराम) के अच्छे दोस्त थे। उनके साथ गांव में कबड्डी खेलते थे,
अखाड़े में कुश्ती करते थे। मेरे पिताजी के साथ उनकी फोटो भी थी, लेकिन अब वह
भी नहीं रहे।' गांव में लोगों से बातचीत में ही यह पता चलता है कि अपने सुरों
से दुनिया में राज करने वाले मेहदी हसन पहलवानी भी करते थे।

शाम के झुरमुट में हम गांव की गलियों से गुजरते हैं। गांव के छान-छप्परों से
धुआं उठ रहा था। लगा हवा में लहराते दरख्त मेहदी हसन की गजल गुनगुना उठे हों-
''ये धुआं सा कहां से उठता है, देख तो दिल कि जां से उठता हैं ' कुओं पर बीते
वक्त की वास्तु के पनघट बने हैं। इन पर चकली की जगह लकड़ी के बड़े चक्के लगे
हैं जिन पर कभी चरस से पानी खींचा जाता होगा। एक सरकारी स्कूल के परिसर में ही
पिछवाड़े एक मजार है। यह मेहदी हसन के दादा इमाम खां की मजार है, जो शास्त्रीय
संगीत के अच्छे ज्ञाता माने जाते थे। उन्हीं से मेहदी हसन ने गायन सीखा। मजार
पर पहले कुछ नहीं था।

एक ग्रामीण युवक मुकुट सिंह ने बताया कि कोई एक दशक पहले मेहदी हसन निजी यात्रा
पर इस मजार को ठीक कराने के लिए ही आए थे। तब वे झुंझुनूं से अपने साथ दो
कारीगर लेकर आए थे, जिनसे मजार पर कुछ निर्माण कराया। मेहदी हसन की इस यात्रा
के पीछे छिपे उनके दर्द को महसूस किया जा सकता है। अपनी जमीन से उखड़ जाने पर
पीछे छूटी यादें किसी यातना से कम नहीं होती। मजार की बदहाली देखकर रोना आता
है। मजार अब भी उतनी ही वीरान और सन्नाटे से भरी है, जितना उसके पास खड़ा एक
सूखा दरख्त। यह मजार ही जैसे मेहदी हसन को लूणा बुलाती रहती है। मानो रेत के
धोरों में हवा गुनगुनाने लगती है- '' भूली बिसरी चंद उम्मीदें, चंद फसाने याद
आए, तुम याद आए और तुम्हारे साथ जमाने याद आए।'' नारायण सिंह कभी-कभी जुम्मे पर
इस मजार पर हो आते हैं।

नारायण सिंह अपने बेटों-पोतों के साथ ही कई घरों के बीच बनी एक कोठरी में रहते
हैं, लेकिन भगवा वस्त्रों में। दस साल पहले अपनी पत्नी के निधन के बाद उन्होंने
संन्यास ले लिया। कोठरी में एक तानपुरा भी रखा है। उन्होंने बताया कि मेहदी हसन
के दादा इमाम खां से उन्होंने भी संगीत की तालीम पाई। आध्यात्मिक संगीत में
उनकी रूचि है, लेकिन गजलें उन्हें नहीं आती। मेहदी हसन की भी कोई गजल उनको याद
नहीं। वे कहते हैं- ''मेहदी हसन ने शास्त्रीय रागों से गजल को जोड़ा, इसलिए वे
प्रसिद्ध हुए।'' नारायण सिंह दिनभर अपनी पुरानी किताबों की जिल्द बनाकर सिलाई
करते रहते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें कुरान भी आती है। उन्होंने रामचरित मानस
के उर्दू अनुवाद की एक दुर्लभ पुस्तक भी दिखाई।

लूणा गांव में लगभग 8 वर्ष की उम्र में ही मेहदी हसन ने ठुमरी, खयाल और दादरा
में गायकी सीख ली थी। अपने पिता उस्ताद अजीम खां से भी उन्होंने शास्त्रीय गायन
की तालीम ली। रेत के धोरों में संगीत की स्वर लहरियां जैसे आज भी मेहदी हसन को
सुनाई देती हैं और वे इस धरती पर खिंच कर चले आते हैं।

गांव में किसी से भी पूछो कि मेहदी हसन के पुराने घर कहां हैं, तो लोग सकुचाने
लगते हैं। ज्यादातर लोग जुबान सिल लेते हैं। लगता है जैसे कोई गलत बात पूछ ली
हो। एक ग्रामीण रामेश्वर दबे स्वरों में बताता है-'' जहां मेहदी हसन के कच्चे
घर थे, वहां अब भागीरथ मीणा की पक्की कोठी है। ऐसी कोठी पूरे गांव में नहीं है।
मीणा एक सरकारी अधिकारी हैं जो बाहर रहते हैं।''

पूरे गांव में बहती फिजां में मेहदी हसन की मौजूदगी का अहसास लगातार बना रहता
है, लेकिन उनकी पुरानी यादों के ज्यादा पन्ने अब खुल कर सामने नहीं आते। उनके
साथी नारायण सिंह के जेहन में भी बचपन की ज्यादा यादें बची नहीं हैं। वे अपनी
उम्र 90 वर्ष बताते हैं, हालांकि इतनी उम्र के लगते नहीं हैं। कहते हैं-
''मेहदी हसन के पिता अजीम खां मंडावा के ठाकुर के यहां दरबारी गायक थे जिन्हें
गाने के बदले ठाकुर साहब से जमीन भी मिलती थी। चाचा इस्माइल खां पहलवान थे,
जिनके अखाड़े में मेहदी हसन और उनके बड़े भाई गुलाम कादिर के साथ मैं भी जाता
था। मेहदी हसन की दो बहनें थीं- रहमी और भूरी।''

मेहदी हसन जब भी लूणा गांव आते हैं, वे नारायण सिंह से जरूर मिलते हैं। वे दो
बार सरकारी मेहमान बन कर भी आ चुके हैं। लूणा इस बार फिर उनके आने की प्रतीक्षा
कर रहा है। हैरत की बात यह है कि लूणा को लेकर मेहदी हसन के दिल में आज भी
जुनून कम नहीं हुआ है। समय की परतें भी इसे दबा नहीं पाई हैं। तानसेन के बारे
कहा जाता है कि लोग उनकी मजार पर जाते हैं तो कान के पीछे हाथ लगाकर सुनने की
कोशिश करते हैं- क्या पता कब उनके सुर फूट पड़े। लूणा गांव भी उनके आने की
आहटों को कुछ इसी तरह सुनता रहता है। इस बार जब वे लूणा गांव आकर वापस लौटेंगे
तो कौन जाने उनके मन में अपनी ही गजल के ये स्वर गूंज रहे होंगे-'' अब के हम
बिछुड़े तो शायद ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।''

Monday, April 9, 2012

पंकज मल्लिक अनमोल तथ्‍य

पंकज मल्लिक एकदम शुरूआत से यानी 1927 से ही रेडियो कोलकाता का हिस्‍सा रहे थे।
रेडियो से उनका जुड़ाव इतना गहरा था कि वे आजीवन हर वर्ष दुर्गा पूजा के मौक़े पर 'महिषासुर मर्दिनी' नामक सजीव रेडियो प्रसारण करते थे। इसकी शुरूआत 1931 में हुई थी। आगे चलकर इसका एल.पी. भी जारी किया गया। जो हमारे संग्रह का गौरवशाली हिस्‍सा है। तकरीबन पचास वर्षों तक पंकज मल्लिक रेडियो का हिस्‍सा रहे।

विविध-भारती के पास पंकज मल्लिक का एक पांच मिनिट का अनमोल इंटरव्‍यू है। जिसमें उन्‍होंने अपने जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में बताया है।

पंकज मलिक के संगीत निर्देशन में ना केवल कुंदनलाल सहगल ने गाया है। बल्कि सचिन देव बर्मन, हेमंत कुमार गीता रॉय और आशा भोसले जैसे हिंदी संगीत के दिग्‍गजों ने गाया। 1973 में पंकज मल्लिक को सिनेमा में महत्‍वपूर्ण योगदान के लिए दादासाहेब फालके पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था।

फिल्‍म्‍स डिविजन ने पंकज मल्लिक पर एक वृत्‍तचित्र तैयार किया है। जिसे आप ऑनलाइन यहां देख सकते हैं।

पंकज मल्लिक के अनमोल चित्रों के लिए यहां क्लिक कीजिए।

 

रेडियोवाणी पर पंकज मल्लिक का गीत--'तेरे मंदिर का हूं दीपक' यहां सुना जा सकता है।

 

 

Monday, January 9, 2012

चिन्‍न पोन्‍नू का मशहूर तमिल गीत 'नाका मुका'

नाकामुका / चिन्‍न पोनू की आवाज़
Song: Naakka Mukka
Movie: Kadhalil Vizhunden
Language: Tamil
Cast: Nakul, Sunaina
Singers: Chinnaponnu, Nakul
Music: Vijay Antony

 

वर्ल्‍ड कप उद्घाटन समारोह का वीडियो

चेन्‍नई सुपर किंग प्रमोशनल वीडियो

नाकामुका के अर्थ पर गिरी-धर का ब्‍लॉग
यहां क्लिक कीजिए।

नाका मुका के तमिल बोल

Adra AdraNaakka

Ey Adra AdraNaakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka
Ey Maadu Setha Manusan Thinnan
Thola Vechi Mela Katti
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka

Ah...Ahahah..
Ey Oyyaarama Ootula Koli Kolambu Kodhikkudhu
Elephantu Gatula Kickmatter Vikkudhu
Ellisu Rottula Pullimaanu Nikkudhu
Vettaiyaadi Pudingada Vegavechi Thinnungada
Engadaa Ingadaa Ala Udunga Devuda
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka

Ah...Ahah..
Ey..Ey Apdipodu..Ahah..Ey..Aahaa
Ey Kuthaangallu Pottu Vechu Olakudisa Nikkudhu
Nattaangallu Pottu Vechu Naataangallu Irukkudhu
Achacho Moonupogam Oru Pogam Aachudaa
Kaayavecha Nellu Ippo Kadatheruvey Pochudaa
Nattu Vecha Naathu Ippo Karuvaada Aachudaa
Aravayiru Kaavayiru Pasithaan Pattini
Saavudhaan Ethini? Engadaa Ingadaa
Adingada Adingada Raajavukku Ketkattum
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka

Ah...Ohoh..Ahah..Ohoh..OiOiOiOi..
Kirukirukiru Raattanam Thalaiya Chuthi Ooduthu
Paraparapara Pattanam Aakkapolil Vizhikkudhu
Vellikaasu Venundaa Kannakaattu Devuda
Adingada Adingada
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka

Aahaa..Eyappadithaan..Eyohoh..Eyippadithaan..
Viruviruviru Meteru Engilisu Matteru
Raathirikku Quateru Vidinjirichu Endhiri
Adra Adra Adra Adra
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Adra Adra Naakka Mukka Naakka Mukka
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka
Ahahahahahah..
Ahahahahahah..
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka Naakku
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka Naakku
Naakka Mukka Naakka Mukka Naakka Mukka Naakku

Sunday, July 10, 2011

संगीतकार दान सिंह की याद में

दानसिंह जी के कुछ वीडियोज़।
दानसिंह पर मेरा आलेख रेडियोवाणी पर यहां पढिए।

कला अंकुर अजमेर के कार्यक्रम में।

पत्रकार ईश मधु तलवार का लिया दानसिंह जी का इंटरव्‍यू

 

फिल्‍म 'माइ-लव' का गाना--सुनते हैं सितारे रात भर

Friday, April 2, 2010

ghar aaja ghir aaye from film chhote nawab: analysis by ankush chinchankar

Film: Chote Nawab (1961)
Producer: Usman Ali
Director: S.A.Akbar
Lyrics : Shailendra
Singer: Lata Mangeshkar
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A song complete in its form... a base that is Indian Classical… sung by an artist who is at the crest of the singing, the melody queen herself… named Lata Mangeshkar… written by the most renowned lyricist of the hindi film industry, Shailendra and composed by Rahul Dev Burman, Son of S. D. Burman.


It was Pancham's first ever film, Chhote Nawab, Produced by Mehmood's home production under the name of Mumtaz Films. In 1961, Mehmood asked Pancham to compose music for his next film. By then Pancham was known as Dada's assistant and a great arranger.

Pancham was happy to to do his first ever independent film, 'Chhote Nawab'. It is the first ever song sung by Lata didi under his direction.

When the song was recorded even Lata didi admired Pancham's talent. The song was based on Raag Malgunji, which is a mixture of Raag Bageshree and Raageshree. Marutirao Keer who assisted Dada Burman in his rhythm patterns, also arranged a perfect Rupak ( a taal which has 7 beats..1-2-3, 1-2-3-4 pattern). If observed minutely, one can see that most of the senior Burman's songs were in the same beat fashion. Pancham had obviously decided to follow his father to be crowned as 'Chhote Nawab'.

The cross line of the song , 'Mora Jiya Dhak Dhak Re', is the typical style of Pancham, which he never left. The song is in standard format as a short intro music and repetition of 1st and 3rd interlude music, a regular style of the 50's and 60's.

One can feel the use of Ghungroo which he has played loud to get the feeling of a dancing female.

All these together created a history and a new music director was born to rule the film industry. Ghar Aaja Ghir Aaye was the stepping-stone for Pancham and his musical carrier.

listen the song
here on youtube.
Ankush Chinchankar. Courtesy: punchammagic.org

Sunday, January 3, 2010

R D burman : experimnet with sounds and instruments

RD Burman started his career as an assistant to his father, Sachin Dev Burman. The mouth organ played in the song ’Hai apna dil to awara’ sung by Hemant Kumar in the film ’Solva Saal’ is played by RD Burman himself. He assisted his father in Chalti ka Naam Gaadi (1958) and Kaagaz ke Phool(1959). His first film as a music director was Guru Dutt’s Raaz (1959). However, the film was shelved after some shooting and recording of a few songs. He then got his break in Mehmood’sChhote Nawaab in the year 1961. His compositions in the film Teesri Manzil starring Shammi Kapoor made him a celebrated composer. The songs like ’O’ haseena zulfon waali’, ’Aaja aja main hoon pyaar tera’, ’O mere sona re sona ee’, ’Deewaana mujhsa nahin’ were unlike anything audiences had heard of till then and the music of Teesri Manzil was hummed across the nation.

RD Burman was very innovative and experimental. He picked the music for his songs from very indigenous sources. In fact, innovativeness became synonymous with RD. He has been quoted as saying, “I don’t say that I am a knowledgeable man when it comes to raags. I don’t say I tried to do so and so song in
 Raag Darbari or attempted some difficult raag in another song. Whatever comes to my head I compose.”

In ’Chura liya hai tumne’ he used the sound of a spoon hitting a glass. For the Kitaab song ’Master jee kee aa gayee chitthee’ he brought some desks from a classroom in the studio while recording and used them as percussion.

In Abdullah he used the sound of a bamboo whistle with a balloon tied to it for a song. Once, to get the sound of raindrops, he spent a whole rainy night in his house’s balcony recording the sound he wanted.

In the song ’O manjhi re’ from the movie Khushboo, RD Burman used bottles with water filled at different levels and created a hollow sound by blowing into them and this sound effect was used with the orchestra.
During the recording of ’Hum dono do premee’ (Ajnabee), the musicians were on strike. So he improvised the song with emptied-out musical interludes and just listen to the song!

Many people say that Pancham Da plagiarised, which is not completely wrong. But while plagiarising too, he kept his unique stamp of authority over the number. Today, most of the originals may have been wiped off from memory, but the inspired numbers remain. His inspiration of "copying the tune" extended to incorporation of different forms of tunes and rhythm patterns into his music.
No matter what the people say but I can assert that RD was one of the best composers. A publicity-shy man, RD let his music do the talking for him. The list of the compositions is so huge that you can pick a song for every moment of your life. I met few pretty faces in Delhi very recently and remembered the last composition of Pancham Da from film ’1942-A Love Story’, ’Ek ladki ko dekha to aisa laga’.

RD continues to rule today as well. This is evident from most of the soundtracks today being re-mixed in the Indi-pop scene are RD’s compositions. You might not be aware of this but you must have rocked and danced to his songs.



Excerpts from this link
listen "yaad hai pancham" a nazm by gulzar on radiovani here from the album 'chand parosa hai' 

Wednesday, December 2, 2009

मैं पीड़ा का राजकुंवर हूं: गोपालदास नीरज


गोपालदास 'नीरज' की इस रचना और फिल्‍म 'ओए लकी ओए' के गाने 'तू राजा की राजदुलारी' में
मुझे बड़ी समानता नज़र आती है । ये गाना रेडियोवाणी पर यहां सुना जा सकता है ।

मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ, तुम शहजादी रूपनगर की
हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?

मेरा कुर्ता सिला दुखों ने,
बदनामी ने काज निकाले,
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
अम्बर ने खुद जड़े सितारे
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा

मैं जन्मा इसलिये कि,
थोड़ी उम्र आँसुओं की बढ़ जाए
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी
रोज नए कंगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखांतकी, मैं दुखांतकी
मिल भी गए अंक अपने तो रस अवतरण कहाँ पर होगा?

मीलों जहाँ न पता खुशी का,
मै उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ
नित होंठ करें गीतों का न्यौता
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा?

इतना दानी नही समय कि
हर गमले में फूल खिला दे
इतनी भावुक नही जिंदगी
हर खत का उत्तर भिजवा दे
मिलना अपना सरल नहीं पर फिर भी ये सोचा करता हूँ,
जब ना आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहाँ पर होगा..?

हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..